आज फिर एक घर बनाया था मैंने, घर सपनो की दीवारों का, ख्वाबों के दरवाजों का,
उम्मीदों की सीढियां थी जिसमें , रोज़ की तरहा, घर की दीवारें टूटती,
फिर मैं मशगूल हो जाता उन्हें मढ़ने दोबारा...
फिर मैं मशगूल हो जाता उन्हें मढ़ने दोबारा...
एक सीढ़ी का इजाफा रोज़ ही होता था उसमें , पर उस आखिरी सीढ़ी तक पहुंचना मुश्किल भी है , मुमकिन भी है....
इस पशोपेश में मैं भूल आया, मखमली चादर जो बिछायी थी तमन्नाओं के पलंग पर,
वोह न जाने क्यूँ मैली हो गयी है...
इस पशोपेश में मैं भूल आया, मखमली चादर जो बिछायी थी तमन्नाओं के पलंग पर,
वोह न जाने क्यूँ मैली हो गयी है...
बार बार उसे साफ़ करना रास मुझे अब आता नहीं,
जिस दिन उसे कर साफ़ सोता हूँ तो मानो ... डूब जाता हूँ कहीं,
और तब वो आखिरी सीढ़ी मुझे लुभाती नहीं...
और उन दीवारों की चिंता मुझे सताती नहीं..
आज फिर एक घर बनाया है मैंने, घर सपनो की दीवरों का, ख्वाबों के दरवाज़ों का....
और उन दीवारों की चिंता मुझे सताती नहीं..
आज फिर एक घर बनाया है मैंने, घर सपनो की दीवरों का, ख्वाबों के दरवाज़ों का....
